सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन में बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा निकाले गए पत्र 'मूकनायक', 'बहिष्कृत भारत', 'समता', 'जनता', 'प्रबुद्ध भारत' आदि अमूल्य दस्तावेज़ की तरह हैं। डॉ. आंबेडकर को यह अच्छी तरह अहसास था कि बहिष्कृतों 1 (दलितों) को उनका हक दिलाने के लिए कई स्तर पर संघर्ष करना होगा। एक तरफ ब्रिटिश सत्ता से अपने हक-हकूक की माँग करनी होगी तो दूसरी तरफ स्वराजियों से अपने हकों के लिए संघर्ष करना पड़ेगा। लेकिन यह सब तभी संभव है, जब बहिष्कृत समाज शिक्षित बने और आपस में संगठित हो। 'मूकनायक' की हर संपादकीय और उसमें प्रकाशित लेखों में इसे स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है। मूकनायक के सौ वर्ष पूर्ण होने पर यह लेख आंबेडकर की पत्रकारिता की गहरी पड़ताल करता है।
डॉ. आंबेडकर का मानना था कि अस्पृश्यों के साथ होनेवाले अन्याय के खिलाफ, उन्हें संगठित करने के लिए उनका स्वयं का समाचार पत्र का होना जरूरी है। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए डॉ. आंबेडकर ने 29 वर्ष की अवस्था में 31 जनवरी, 1920 को मराठी भाषा में पाक्षिक समाचार पत्र 'मूकनायक' प्रकाशित किया। 'मूकनायक' यानी मूक लोगों का नायक। 'मूकनायक' के प्रकाशन के लिए शाहू महाराज ने ढाई हजार रूपये की आर्थिक सहायता दी थी। डॉ. आंबेडकर मुम्बई के सिडनहेम कॉलेज में प्राध्यापक थे, सरकारी सेवा में थे, इसीलिए उन्होंने संपादक के रूप में पांडुरंग नंदराय भटकर का नाम डाला। बाद में ज्ञानदेव ध्रुवनाथ घोलप इस पत्र के संपादक बने। 'मूकनायक' पाक्षिक के रूप में शनिवार को प्रकाशित होता था। इसके प्रथम पृष्ठ पर संत तुकाराम की दो पंक्तियाँ दी गई थीं - 'काय करूं आतां धरूनियां भीड़, निःशंक हें तोंड वाजविलें/नव्हे जगी कोणी मुकियांचा जाग, सार्थक लागुन नव्हे हित।' (अर्थात् अब संकोच करने का कोई कारण नहीं है। अब निःशंक होकर बात करूँगा। मूक होकर जीने में कोई मतलब नहीं है, लाज-संकोच से किसी का हित नहीं होता।) 'मूकनायक' के प्रथम अंक में 'मनोगत स्तंभ' के अंतर्गत डॉ. आंबेडकर ने हिन्दू समाज व्यवस्था पर टिप्पणी की थी कि ''हिन्दू समाज व्यवस्था एक मीनार की तरह है। इस मीनार की सीढ़ी ही नहीं है और इसी कारण एक तल्ले से दूसरे तल्ले पर जाने के लिए यहाँ रास्ता ही नहीं है। जिस तल्ले में जिसका जन्म होता है, वहीं उसे मरना पड़ता है। नीचे के तल्ले का व्यक्ति कितना भी योग्य हो, उसे ऊपर के तल्ले पर प्रवेश नहीं और ऊपर के तल्ले का व्यक्ति कितना भी नालायक हो, तो उसे नीचे के तल्ले में भेज देने की किसी की हिम्मत नहीं। स्पष्ट शब्दों में बोलना हो तो जाति-जाति में ये जो ऊँच और नीच की भावना है, वह गुणावगुणों की नींव पर नहीं हुई है। ऊँच जाति में जिसने जन्म लिया है वह कितना भी अवगुणी हो, तो भी वह ऊँच ही कहलाएगा और नीच जाति में जिसका जन्म हुआ है, वह कितना भी गुण संपन्न हो, तो वह नीच ही कहलाएगा।'' 2 'मूकनायक' की आरंभिक दर्जन भर संपादकीय टिप्पणियाँ आंबेडकर ने स्वयं लिखी थी, जिनमें मुख्यतः जातिगत गैर-बराबरी के खिलाफ आवाज बुलंद की गई है।
अखबारों के जातिगत पूर्वग्रह से डॉ. आंबेडकर काफी व्यथित थे। उनका मानना था कि यदि कोई अखबार किसी जाति विशेष को नुकसान पहुँचाता है तो वह पूरे समाज का अहित करता है जिसमें सभी जातियाँ शामिल हैं। इस तथ्य को उन्होंने 'मूकनायक' के संपादकीय में एक ही नाव में सवार लोगों के उदाहरण से समझाया कि "ऐसे समाचार-पत्रों से हमारा कहना है कि समाज में यदि कोई एक जाति पतन की ओर जाती है तब उसकी अवनति का कलंक दूसरी जातियों पर लगने से रोका नहीं जा सकता है। समाज एक नाव की तरह ही है। जिस तरह किसी बोट में बैठकर सफर कर रहे होते हैं। यदि उसी समय किसी यात्री के मन में जान-बूझकर दूसरे यात्रियों को हानि पहुँचाने की इच्छा उठती है तो वह अपने दुष्ट स्वभाव के कारण यदि बोट के दूसरे कमरे में छेद कर दिया तो उसमें दूसरों के साथ देर से ही सही स्वयं उसे भी डूब कर जल समाधि लेनी पड़ेगी।'' 3
14 फरवरी, 1920 में 'मूकनायक' के दूसरे अंक में डॉ.आंबेडकर का लेख 'स्वराज्याची सर सुराज्याला येणार नाही' छपा, जिसका हिन्दी में अर्थ है 'सुराज्य की तुलना में स्वराज्य अधिक श्रेष्ठ होता है।' डॉ. आंबेडकर ने यह सवाल पुरजोर तरीके से प्रस्तुत किया कि, यह स्वराज किसके लिए? क्या यह स्वराज बहिष्कृतों-अछूतों (दलितों) के लिए भी होगा? क्या इसमें उनकी भी बराबरी के आधार पर सहभागिता होगी? या यह स्वराज सदियों से अछूत कहे जाने वाले लोगों पर अत्याचार कर रहे उच्च जातियों का स्वराज होगा? इतना ही नहीं वे 28 फरवरी, 1920 में मूकनायक के तीसरे अंक में कहते हैं कि ''स्वराज्य में अगर सत्ता सुख कुछ विशिष्ट लोगों के हाथों में जा रही हो तो इसे 'स्वराज्य' कैसे कहेंगे?' उन्होंने तो नागरिक को परिभाषित किया कि नागरिक वह है, जिसे निम्न अधिकार प्राप्त हों-1. व्यक्तिगत स्वतंत्रता, 2. व्यक्तिगत सुरक्षा, 3. व्यक्तिगत संपत्ति रखने का अधिकार, 4. कानून की दृष्टि से सभी में समानता, 5. सद्बुद्धि अर्थात् विवेक के अनुसार आचरण करने की स्वतंत्रता, 6. सभा लेने की स्वतंत्रता और मत स्वतंत्रता, 7. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, 8. देश में राजकारोबार हेतु अपने लोक प्रतिनिधि भेजने का अधिकार, 9. सरकारी नौकरी प्राप्त करने का अधिकार। परन्तु सामाजिक बंधनों के कारण उपर्युक्त अधिकारों में से अधिकांश अधिकार अछूतों को नहीं है अथवा उनके इन अधिकारों को यहाँ की समाज व्यवस्था ने छीन लिया है।'' 4
डॉ. आंबेडकर ने हिंदू धर्म में ऊँच-नीच के भेदभाव के सवाल को बड़ी मजबूती के साथ उठाया था। उन्होंने जातिप्रथा रूपी छुआछूत पर तीखा प्रहार करते हुए 'मूकनायक' के 14 अगस्त 1920 के अंक में संपादकीय में लिखा कि "कुत्ते-बिल्ली जो अछूतों का भी जूठा खाते हैं, वे बच्चों का मल भी खाते हैं। उसके बाद वरिष्ठों-स्पृश्यों के घरों में जाते हैं तो उन्हें छूत नहीं लगती। वे उनके बदन से लिपटते-चिपटते हैं। उनकी थाली तक में मुँह डालते हैं तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होती। लेकिन यदि अछूत उनके घर काम से भी जाता है तो वह पहले से बाहर दीवार से सटकर खड़ा हो जाता है। घर का मालिक दूर से देखते ही कहता है-अरे-अरे दूर हो, यहाँ बच्चे की टट्टी डालने का खपड़ा रखा है, तू उसे छूएगा?" स्पष्टतया यह संपादकीय टिप्पणी जाति में बँटे भारतीय समाज को आईना दिखाने में आज भी सक्षम है। वर्ष 1923 में 'मूकनायक' का प्रकाशन बंद हो गया।
'मूकनायक' के बाद डॉ.आंबेडकर अपने को आजीवन पत्रकारिता से अलग नहीं कर पाए। पत्रकारिता हमेशा उनके संघर्षों का एक महत्त्वपूर्ण हथियार बनी रही। पढ़ाई पूरी कर लंदन से लौटते ही उन्होंने तत्कालीन चुनौतियों को स्वीकारते हुए, अछूतों के आंदोलन को नई धार देने हेतु अपनी सक्रियता बढ़ायी। उन्होंने 1924 में 'बहिष्कृत हितकारिणी सभा' की स्थापना की। अपने विचारों, आंदोलनों को सरकार, बहिष्कृत समाज तथा संवेदनशील सवर्णों तक पहुँचाने के लिए उन्होंने 3 अप्रैल, 1927 (रविवार) को 'बहिष्कृत भारत' पाक्षिक पत्रिका का संपादकत्व संभाला। बहिष्कृत भारत में करीब 75 प्रतिशत सामग्री बाबासाहेब द्वारा स्वयं लिखी गई। रातभर जागते हुए उन्होंने स्वयं बहिष्कृत भारत के चौबीस कॉलमों को लिखा। यह वही समय था जब आंबेडकर का महाड़ आंदोलन ज़ोर पकड़ रहा था। उन्होंने देखा कि समाज में जातिगत विषमता इस कदर भरी हुई है कि जिस तालाब का पानी पशु-पक्षी तो पी सकते हैं पर उसी तालाब का पानी दलित समाज के लोग नहीं भर सकते। दलितों का तालाब से जल भरने के अधिकार के लिए महाड़ आंदोलन की एक-एक बातें बहिष्कृत भारत में दर्ज हैं। महाड़ क्रांति को फ्रांस की राज्यक्रांति के समानांतर माना जाता है, क्योंकि इस आंदोलन में समानता, स्वतंत्रता एवं बंधुता को अमली जामा पहनाने की पुरजोर कोशिश की जाने लगी। महाड़ में ही उन्होंने 25 दिसंबर 1927 को सार्वजनिक रूप से 'मनुस्मृति' का दहन कर दलित मुक्ति ही नहीं अपितु मानवता की मुक्ति का संदेश दिया।
20 मई 1927 को प्रकाशित 'बहिष्कृत भारत' के चौथे अंक के संपादकीय में बाबासाहेब ने जो लिखा उसके मुताबिक़ पिछड़े वर्ग को आगे लाने के लिए सरकारी नौकरियों में उसे प्रथम स्थान मिलना चाहिए। बहिष्कृत भारत के संपादकीय 'अस्पृश्यता निवारण: बच्चों का खेल' अस्पृश्यता के प्रश्न का ऐतिहासिक विवेचन करता है और अन्य धर्मों एवं समुदायों में इसकी उपस्थिति के स्वरूप का विस्तृत विवेचन करती है। इसी संपादकीय में डॉ. आंबेडकर ने ब्रिटिश सत्ता और ब्राह्मणी सत्ता को हिन्दू जनता के शरीर पर लगे दो जोंकों की तरह प्रस्तुत किया है। उन्होंने लिखा कि "हमारे मतानुसार ब्रिटिश सत्ता तथा ब्राह्मणी सत्ता हिंदू जनता के शरीर पर लगे दो जोंक हैं, तथा ये बिना रूके भारतीय जनता का खून पी रहे हैं। अंग्रेजी सत्ता ने लोगों को देह से गुलाम बनाया है, तो ब्राह्मणी सत्ता ने जनता की आत्मा (दिमाग) को गुलाम बनाया है। अंग्रेजी सत्ता ने भारत की संपत्ति की शोषण किया है, तो ब्राह्मणी सत्ता ने स्वाभिमान जैसी मन की संपत्ति का हरण किया है।" 5 डॉ. आंबेडकर अंतर-जातीय विवाह के पक्षधर थे और अपने पाठकों को इसकी सूचना भी देते थे, ''वे इसके लिए 'मिश्र विवाह' शब्द का प्रयोग करते थे। मिश्र विवाह करनेवालों का वे अभिनंदन भी करते थे। 1 मार्च, 1929 के 'बहिष्कृत भारत' में उन्होंने इसका जिक्र किया है और इसे क्रांतिकारी घटना माना है।'' 6 भारत में ही नहीं वरन् विश्व के किसी भी कोने में स्थापित श्रेणीबद्धता की प्रथा को वे अमानवीय मानते थे। 'बहिष्कृत भारत' के 15 मार्च, 1930 के अंक में उन्होंने अफ्रीका में अछूतों की स्थिति पर टिप्पणी लिखी थी। इसी अंक में विवेकानंद को उद्द्यृत करते हुए उन्होंने लिखा कि ''विवेकानंद का संदेश है, 'उठो! मर्द बनो! प्रगति के रास्ते में प्रतिरोध करने वाले भिक्षुक, पुरोहित वर्ग को ठोकर मारकर उड़ा दो क्योंकि इस वर्ग में सुधार की कोई संभावना नहीं है। इस वर्ग का अंतःकरण कभी भी विशाल हो नहीं सकता। यह वर्ग सैकड़ों वर्षों से रूढ़ियों तथा अत्याचारों का गुलाम है। सबसे पहले पैरोहित्यशाही को नष्ट करे। उठो! मर्द बनो! अपने संकुचित दम घोंटनेवाले घोंसले से बाहर निकलो तथा चारों ओर नज़र फेको।'' 7 'बहिष्कृत भारत' की उपलब्धियों पर डॉ गंगाधर पानतावणे की यह महत्त्वपूर्ण प्रतिक्रिया है, '''बहिष्कृत भारत' एक आंधी थी। हिन्दू समाज में आया हुआ यह एक तूफान था। डॉ.आंबेडकर के ब्राह्मण सहयोगी 'समता' पत्र के संपादक श्री दे.वि.नाईक ने तत्कालीन ब्राह्मणों से यह सिफारिश की थी कि ''वे आंबेडकर के इस लेख को पढ़े। निरंतर मीठी चीजें ही निरंतर अच्छी लगती है। मीठी चीजों को ही ग्रहण करने की आदत बहुत दिनों से लग जाने से डॉ.आंबेडकर यह लेखन जहर की तरह कड़वा लगेगा परंतु बाद में यह अहसास होगा कि यह तो अमृत की तरह मीठा है।'' 8
भारतीय समाचार-पत्रों के जातिवादी चरित्र के साथ ही पत्रकारिता के व्यवसायिक स्वरूप और अनैतिक आचरण से आंबेडकर काफी व्यथित और आक्रोशित होकर कहते हैं कि "भारत में पत्रकारिता पहले एक पेशा थी। अब वह एक व्यापार बन गई है। अखबार चलाने वालों को नैतिकता से उतना ही मतलब रहता है जितना कि किसी साबुन बनाने वाले को। व्यक्ति पूजा उनका मुख्य कर्तव्य बन गया है। भारतीय प्रेस में समाचार को सनसनीखेज बनाना, तार्किक विचारों के स्थान पर अतार्किक जुनूनी बातें लिखना और जिम्मेदार लोगों की बुद्धि को जाग्रत करने के बजाय गैर-जिम्मेदार लोगों की भावनाएँ भड़काना आम बात हैं। … व्यक्ति पूजा की खातिर देश के हितों की इतनी विवेकहीन बलि इसके पहले कभी नहीं दी गई। व्यक्ति पूजा कभी इतनी अंधी नहीं थी जितनी कि आज के भारत में है। मुझे यह कहते हुए प्रसन्नता होती है कि इसके कुछ सम्मानित अपवाद हैं, परंतु उनकी संख्या बहुत कम है और उनकी आवाज़ कभी सुनी नहीं जाती।'' 9 भारतीय पत्रकारिता व्यक्ति पूजा से ग्रसित है, को उद्धृत करते हुए आंबेडकर कहते हैं कि 'भारतीय पत्रकारिता पहले अपने नायक को तय कर लेती है और उसे महापुरुष बनाने के लिए उसकी पूजा करना ही उसका लक्ष्य रह जाता है। उसे यह ध्यान में रखना चाहिए कि व्यक्ति पूजा अंधी होने से समाचारपत्रों में सत्य को कोई स्थान नहीं मिलता और वहाँ असत्य को ही सत्य मान लिया जाता है। इसके परिणामस्वरूप पत्रकारिता में नैतिकता को कोई जगह नहीं मिलती।' डॉ. आंबेडकर का स्पष्ट कहना था कि धन के लालच में फँसकर अनीति को बढ़ावा देने वाले विज्ञापनों को समाचारपत्रों में छापना नहीं चाहिए तथा अश्लीलता को किसी भी हालत में बढ़ावा नहीं मिलना चाहिए।
समाचारपत्रों को बिना किसी भेदभाव के जनहित को दृष्टिगत रखते हुए सार्वजनिक विषयों के संबंध में अपना मत प्रतिपादन करना चाहिए और गलती करने वाला चाहे कितना भी बड़ा व्यक्ति क्यों न हो उनकी गलतियों को समाज के सामने लाना चाहिए। 18 जनवरी, 1943 को पूना के गोखले मेमोरियल हाल में महादेव गोविन्द रानाडे के 101वीं जयंती समारोह में 'रानाडे, गाँधी और जिन्ना' शीर्षक से दिया गया डॉ.आंबेडकर का व्याख्यान मीडिया के चरित्र के बारे में उनकी दृष्टि को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने कहा, 'मेरी निंदा कांग्रेसी समाचार पत्रों द्वारा की जाती है। मैं कांग्रेसी समाचार-पत्रों को भलीभाँति जनता हूँ। मैं उनकी आलोचना को कोई महत्त्व नहीं देता। उन्होंने कभी मेरे तर्कों का खंडन नहीं किया। वे तो मेरे हर कार्य की आलोचना, भर्त्सना व निंदा करना जानते हैं। वे मेरी हर बात की गलत सूचना देते हैं, उसे गलत तरीके से प्रस्तुत करते हैं और उसका गलत अर्थ लगाते हैं। मेरे किसी भी कार्य से कांग्रेसी-पत्र प्रसन्न नहीं होते। यदि मैं कहूँ कि मेरे प्रति कांग्रेसी पत्रों का यह द्वेष व बैर-भाव अछूतों के प्रति हिंदुओं के घृणा भाव की अभिव्यक्ति ही है, तो अनुचित नहीं होगा।'
आर्थिक अभाव, अकेले व्यक्ति द्वारा लेखन, प्रतिकूल परिस्थिति की मजबूरीवश 15 नवंबर, 1929 को 'बहिष्कृत भारत' का अंतिम अंक प्रकाशित हुआ, इसके 43 संस्करण निकले। इसी दौरान 'समता' नाम के एक और पाक्षिक पत्र का प्रकाशन 29 जून 1928 को आरंभ हुआ और यह 15 मार्च, 1929 तक निकलता रहा। इसके प्रवेशांक के मुख पृष्ठ पर 'समतेचा उदय' शीर्षक से उत्तमराव कदम की कविता छपी थी। प्रगतिशील सवर्ण हिंदुओं भी समाज में छुआछूत मिटाकर समानता पक्षधर थे। प्रगतिकामी हिंदुओं ने आंबेडकर के नेतृत्व में 'समाज समता संघ' बनाया, जिसकी स्थापना समाज के पढ़े-लिखे और प्रगतिशील विचारोंवाले युवाओं ने की थी। डॉ. आंबेडकर को यह एहसास था कि 'बहिष्कृत भारत' बहिष्कृतों के बीच चर्चित है लेकिन समाज समता संघ द्वारा 'समता' पत्र के माध्यम से सवर्ण हिंदुओं को आत्मचेतस बनाने का काम किया जा सकता है। डॉ. आंबेडकर को 'बहिष्कृत भारत' के साथ ही 'समता' पत्र भी निकालने पड़े। 2 अक्टूबर 1930 को मुंबई की सभा में डॉ. आंबेडकर ने अपने नये पत्र की घोषणा की और 24 नवंबर 1930 को 'जनता' साप्ताहिक का जन्म हुआ। इस पत्र के प्रवेशांक के मुख्य पृष्ठ पर मध्य में 'जनता' बड़े टाइप के अक्षरों में और उसके नीचे 'THE PEOPLE' अंग्रेजी शब्द छपा। 'जनता' उनके द्वारा चलाये जा रहे आंदोलनों की डायरी है। आंबेडकर के आंदोलनों का दस्तावेज़ 'जनता' में निहित है। द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका से दुनिया आक्रांत हो चुकी थी। हिटलर की तानाशाही से मानवता कराह उठी थी। उनके फासिस्टवादी विचारों के प्रतिरोध में आंबेडकर ने 'जनता' में लेख के माध्यम से विरोध करते हुए मानवाधिकारों की वकालत की। 1942 की क्रांति हो या पूना पैक्ट के दरम्यान मालवीय जी, सरोजनी नायडू आदि के बीच जो संवाद हुए हैं, वे सब 'जनता' में प्रकाशित हुए हैं।
आंबेडकर की पत्रकारिता पर विमर्श करते ही गांधी और आंबेडकर के बीच की वैचारिक मतभिन्नता देखने को मिलती है। ''अस्पृश्यता के वैधानिक उन्मूलन, मंदिरों में अस्पृश्यों के प्रवेश और ऐन्टी-अनटचेबिलिटी लीग की भूमिका जैसे सवालों पर हुई बहस में गांधी और आंबेडकर के विचारों में कोई नजदीकी नहीं दिखाई दी।'' 10 गांधी और आंबेडकर का टकराव सबसे उग्र रूप में पृथक निर्वाचन मंडल के प्रश्न पर 1932 में जाकर सामने आया। डॉ. आंबेडकर ने 'पृथक निर्वाचन मंडल' की मांग करके हिंदू समाज का अहित नहीं सोचा था। वे तो बस इतना चाहते थे कि अस्पृश्यों को अपने भाग्य निर्धारित करने में सवर्ण हिंदुओं की कृपा निर्भर न रहना पड़े। उनका मानना था, ''केवल पृथक् निर्वाचन की व्यवस्था द्वारा ही अस्पृश्य अपना सच्चा प्रतिनिधि चुन सकते हैं, जिन पर अस्पृश्यों का पूरा विश्वास हो और जो व्यवस्थापिका में अस्पृश्यों के हितों की लड़ाई लड़ सकें।'' 11 यहाँ ध्यान देने की बात है कि डॉ. आंबेडकर के विचारों के ठीक उलट गांधी के विचार थे। गांधी का मानना था कि इस तरह की योजना हिंदू समाज की एकता को खंडित करने की योजना है। उन्होंने डॉ.आंबेडकर के रवैये को अलगाववादी और हिंदू धर्म के लिए खतरा बताया। इसलिए उन्होंने दलितों के लिए 'पृथक निर्वाचन' किसी भी कीमत पर लागू नहीं होने देने की ठान ली। यही कारण है कि गांधी ने तत्कालीन भारत मंत्री सर सैमुअल हार्ट को पत्र लिखकर कहा कि 'पृथक निर्वाचन' देश के टुकड़े-टुकड़े कर देगा। उन्होंने कहा कि ''यदि दलित जातियों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल का निर्णय किया जाता है, तो मैं आमरण अनशन कर दूँगा। मेरा अनशन तभी समाप्त हो सकेगा, जब सरकार स्वयं ही या लोकमत के दबाव में आकर अपने फैसले पर पुनर्विचार करेगी और दलित जातियों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल बनाने का फैसला वापस ले लेगी।'' 12 ''स्वयं गांधी का यह कहना था कि अस्पृश्य वर्ग को स्वतंत्र रूप से राजनीतिक अधिकार देने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वे हिंदू धर्म में समाहित हैं। अस्पृश्यता निवारण के संबंध में अस्पृश्यों को सवर्ण हिंदुओं के साथ संघर्ष नहीं करना चाहिए।'' 13 गांधीजी सत्य और अहिंसा के बल पर एक अखंड व विराट भारत का सपना देख रहे थे।
बहरहाल, यहाँ यह गौर करने की बात है कि सांसद, विधायक या अन्य जनप्रतिनिधि के सीटें आरक्षित घोषित हो रही हैं, वह आंबेडकर की देन है। आरक्षण का ही नतीजा है कि आप सत्ता तक अपनी थोड़ी बहुत बाते पहुंचा पाते हैं वरना सामाजिक संरचना में जातिव्यवस्था नामक धुंध इस प्रकार छाया हुआ जिसप्रकार की आंबेडकर के समय में थी। आंबेडकर ने तो ब्राह्मणवादी मानसिकता का खुलकर प्रतिरोध किया पर आज कोई जनप्रतिनिधि खुलकर सामने आता नहीं दिख रहा है।
'जनता' में डॉ.आंबेडकर के राजनीतिक विचारों को देखा जा सकता है। ''यदि स्वराज्य का अर्थ राजनीतिक सत्ता से है तो इस देश की सत्ता पूँजीपतियों और उच्च जातियों के बजाय पददलित और सर्वहारा वर्ग के हाथों में होनी चाहिए, तभी इस देश का कल्याण होगा यह स्पष्ट घोषणा उन्होंने 'जनता' के माध्यम से की थी। अत: उस सत्ता को प्राप्त करने के लिए लोकतांत्रिक उपायों और साधनों की चर्चा करना ही 'जनता' पत्र का उद्देश्य था।'' 14 यही कारण है कि सर्वहारा श्रमजीवी वर्ग की सत्ता, वर्ग बोध और साम्राज्यवाद का उच्छेद करने से संबंधित लेखों से इसकी अंतर्वस्तु परिपूर्ण है। 'जनता' पत्र को समाज के सभी वर्ग से आये संपादकों की सेवाएँ प्राप्त हुईं। खासकर ब्राह्मण, कायस्थ जैसे जातियों के देवराव नाईक, गंगाधर नीलकंठ सहस्रबुद्धे, कमलाकांत व्ही. चित्रे, भास्कर रघुनाथ कद्रेकर, काशीनाथ विश्राम सवादकर आदि के अथक परिश्रम से 'जनता' पत्र साकार हुआ। दरअसल 'जनता' में महात्मा गांधी और डॉ.आंबेडकर की मुलाकात, डॉ.आंबेडकर द्वारा विलायत से भेजे गए पत्र, अस्पृश्यों के सत्याग्रह तथा समता सैनिक दल का कार्य, समग्र आंदोलन की गाथा इस पत्र में निहित है। 'जनता' 28 जनवरी 1956 (26 वर्षों) तक निकलता रहा। 'जनता' भारत में दलितों के सबसे लंबे समय तक प्रकाशित होने वाले अखबारों में से है।
'जनता' पत्र के 14 जनवरी 1956 के अंक में डॉ.आंबेडकर ने एक निवेदन प्रकाशित कर 'जनता' पत्र के स्थान पर 'प्रबुद्ध भारत' नाम से एक नया साप्ताहिक प्रारंभ करने की घोषणा की। 4 फरवरी, 1956 को 'प्रबुद्ध भारत' का प्रकाशन शुरू हुआ। डॉ. आंबेडकर द्वारा धर्मांतरण यानी बौद्ध धर्म ग्रहण करने से संबंधित जानकारी का स्रोत 'प्रबुद्ध भारत' रहा है। 'रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया' की स्थापना होने के उपरांत पार्टी की नीति व कार्यों की जानकारी पत्र के माध्यम से प्रकाशित हुई। ''राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा रहे भाषाई राज्य के संबंध में पत्र ने पंडित नेहरू की जमकर आलोचना की है, जिस पर 'श्री नेहरू हटवादी, मूर्ख या गुलामॽ' नामक लेख भी प्रकाशित किया गया है।'' 15 यहाँ यह कहना समीचीन है कि डॉ. आंबेडकर की पत्रकारिता देशवासियों को आगाह करती थी। 'प्रबुद्ध भारत' के 27 अक्टूबर, 1956 के अंक में डॉ. आंबेडकर ने लिखा था कि ''हम लोगों ने नए संविधान को स्वीकार किया है। हम लोगों को इस संविधान प्रणाली का अनुभव नहीं है। उसे इस देश में सतर्कता से नहीं अपनाया गया तो इस देश का विनाश होगा। केवल सफेद टोपियों से काम नहीं चलेगा। सारे राष्ट्र को इकट्ठा बैठकर राजनीति का अध्ययन करना चाहिए। अकेले नेहरू को ही अक्ल है, ऐसी बात नहीं। इस देश में कई लोग नेहरू से भी अधिक बुद्धिमान हैं। जब मैं मंत्रिमंडल में था, उस समय सप्ताह में एक बार कैबिनेट की बैठक होती थी। वहाँ मैंने नेहरू को अच्छी तरह से परखा और देखा है। वे खोखले तरबूज की तरह हैं। इसके अलावा उनके पास कुछ नहीं है।'' 16 पहली दिसंबर 1956 तक 'प्रबुद्ध भारत' का प्रकाशन हुआ।
'मूकनायक' से 'प्रबुद्ध भारत' तक की डॉ.आंबेडकर की पत्रकारिता की 36 वर्षों की जो यात्रा है, वह उनके सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनैतिक जीवन की संघर्ष गाथा है जिसमें उनके विचारों में आए क्रमिक परिवर्तन को इन पत्रिकाओं में प्रकाशित लेखों के माध्यम से देखा जा सकता है। डॉ.आंबेडकर की पत्रकारिता ने समतामूलक समाज की स्थापना में अप्रतिम योगदान किया और दलित और सवर्ण के भेदभाव को मिटाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। लोगों को प्रबुद्ध बनाना, उनमें नई सोच पैदा करना, उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना - ये आंबेडकर की पत्रकारिता का उद्देश्य था। भारत की यशस्वी पत्रकारिता के लिए यह दु:ख की बात है कि आज हमारे पास डॉ.आंबेडकर जैसा कृत-संकल्पित पत्रकार नहीं हैं। इस संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी ने अपनी पुस्तक 'डॉ. आंबेडकर और सामाजिक क्रान्ति की यात्रा' में लिखा है - 'भारतीय समाचार-पत्र जगत् की उज्ज्वल परंपरा है। परंतु आज चिंता की बात यह है कि संपूर्ण समाज का सर्वांगीण विचार करनेवाला, सामाजिक उत्तरदायित्व को माननेवाला, लोकशिक्षण का माध्यम मानकर तथा एक व्रत के रूप में समाचार-पत्र का उपयोग करनेवाला डॉ.आंबेडकर जैसा पत्रकार दुर्लभ हो रहा है।'
बाबासाहेब ने अपने लेखों में भाषा की मर्यादा पर पूर्ण ध्यान दिया है। उनके लेखन की भाषा असंतुलित कभी नहीं हुई। उन्होंने सब समय समतामूलक समाज की वकालत की जो स्वतंत्रता, समता और भाईचारा की नींव पर खड़ी हों। मानवतावादी पैरोकार के रूप में वे विवेक संपन्न और बुद्धिवादी थे, उनका समाज चिंतन वायवी नहीं बल्कि ठोस यथार्थ पर खड़ा था। उनके चिंतन में संपूर्ण समाज की चिंता है। दरअसल, वे किसी के विरोध में अपनी लेखनी नहीं चला रहे थे, बल्कि विशुद्ध रूप से मानवता के हित में अपने पत्रकारीय और लेखकीय कर्तव्य का निर्वहन कर रहे थे। उनके मन में किसी के प्रति ईर्ष्या या वैर नहीं था। उन्होंने स्पष्ट किया है कि उनका झगड़ा किसी जाति, वर्ण से नहीं बल्कि ब्राह्मणवादी मानसिकता से है, ब्राह्मण जाति से नहीं।
डॉ.आंबेडकर द्वारा चलाये जा रहे आंदोलन को भारतीय मीडिया भले ही नज़रअंदाज करती रही पर उनके आंदोलन को विदेशी मीडिया में भी व्यापक रूप से कवरेज मिलती थी। कई नामचीन अंतरराष्ट्रीय अख़बार, डॉ. आंबेडकर के छुआछूत के ख़िलाफ़ अभियानों और गांधी से उनके संघर्षों में काफ़ी दिलचस्पी रखते थे। ''लंदन का 'द टाइम्स', ऑस्ट्रेलिया का 'डेली मर्करी', 'न्यूयॉर्क टाइम्स', 'न्यूयॉर्क एम्सटर्डम न्यूज़', 'बाल्टीमोर अफ्रो-अमरीकन', 'द नॉरफॉक जर्नल' जैसे अख़बार अपने यहाँ आंबेडकर के विचारों और अभियानों को प्रमुखता से प्रकाशित करते थे। इसके अलावा अमरीका के अश्वेतों द्वारा चलाए जाने वाले कई समाचार पत्र-पत्रिकाएँ, आंबेडकर के विचारों और आंदोलनों को अपने यहाँ जगह देते थे। भारत के संविधान के निर्माण में आंबेडकर की भूमिका हो या फिर संसद की परिचर्चाओं में आंबेडडकर के भाषण, या फिर नेहरू सरकार से आंबेडकर के इस्तीफ़े की ख़बर। इन सब पर दुनिया बारीक़ी से नज़र रखती थी।'' 17
आंबेडकर साहित्य के सुचिंतित विद्वान प्रदीप गायकवाड कहते हैं कि 'मूकनायक के प्रकाशन के सौ वर्ष बाद भी पत्रकारिता जगत् में जातिगत पूर्वग्रह बरकरार है। तमाम आधुनिक विचारों के बावजूद जातिगत वर्चस्व की लकीरें और भी बढ़ती जा रही हैं। चिंता की बात है कि समतामूलक समाज का जो सपना बाबासाहेब ने दिखाया वह मिथ्या साबित हो रही है। यथास्थितिवादी लोग जातिगत पूर्वाग्रहों से ग्रसित हैं। खबरों के प्रसारण में दलितों की व्यथा को नज़रअंदाज कर दिया जाता है। मीडिया जगत् में प्रबंधन से लेकर संपादन व प्रसारण के स्तर पर जातिगत रूढिवादिता देखने को मिल रही हैं।' समाचारों के प्रवाह एकसमान हो, इसके लिए आज के मीडिया संस्थानों को भी चाहिए कि वो दलित पत्रकारों की क्षमता के विकास में निवेश करें, इसके लिए उन्हें आस-पास के ऐसे दलित मेधा से संपर्क करना चाहिए, जो अच्छे पढे-लिखे हैं, क़िस्सागो हैं और जो समतामूलक समाज के लिए प्रयासरत हों, उन्हें दलितों के संवाद के माध्यमों को भी सीखने की ज़रूरत है। क्योंकि विषमता की बारीक़ियाँ ग़ैर-दलितों की अनुभवहीन आँखों को नज़र नहीं आ पाती हैं। बीबीसी में प्रकाशित एक रिपेार्ट के अनुसार, ''ऑक्सफ़ैम और न्यूज़लॉन्ड्री द्वारा मीडिया में विविधता पर किए गए सर्वे के नतीजे हमें और भी दु:खी करने वाले हैं। न्यूज़रूम में नेतृत्व वाले 121 ओहदों में से दलित और आदिवासी नदारद हैं। जबकि ऊँची जाति के लोगों ने इनमें से 106 पर क़ब्ज़ा कर रखा है। बाक़ी के पदों में से 5 पिछड़ी जातियों तो 6 अल्पसंख्यकों के पास हैं।'' 18 सूचना का प्रवाह असंतुलित होने से दलित समाज को यह लगता है कि आज भी समाज में वही हालात हैं जो आंबेडकर के समय थी, हालॉंकि आज की स्थिति में थोड़ा परिवर्तन आया है लेकिन यह नाकाफी है। जब तक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से दलित समाज मुख्यधारा में नहीं आ जाते तबतक विकास मात्र एक जुमला के रूप में ही कहा जाएगा।
आजाद भारत में भी दलितों के साथ हो रहे अत्याचारों को आंबेडकर बखूबी महसूस कर रहे थे। यही कारण है कि उन्होंने प्रस्तावित संविधान में समाचारपत्रों को पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करने वाला कानून बनने की बात कही थी। अपनी योजना को प्रस्तुत करते हुए वे कहते हैं कि 'प्रस्तावित संविधान में पारित कानून के द्वारा सरकार एक समिति का गठन करे जो स्वतंत्र और निष्पक्ष समाचार को प्रकाशित करेगी जिसमें सभी विचारों को स्थान मिलेगा। समिति के विश्वस्त सरकार दोनों लोकसभा एवं राज्यसभा के सदस्यों द्वारा तय करे। समाचारपत्रों के संपादक भी इसी प्रकार चुने जाएँ और विश्वस्त तथा संपादकों को हाईकोर्ट के जज समान ही अपने मत को प्रतिपादित करने की स्वतंत्रता हो तथा सरकार का कोई नियंत्रण उसपर नहीं होना चाहिए। विश्वस्त तथा संपादकों को 'अयोग्य वर्तन' का दोषी पाये जाने पर वे स्वयं अपने बचाव में क्या कहते हैं यह देखने के बाद ही लोकसभा एवं राज्यसभा द्वारा पारित प्रस्ताव से बर्खास्त किया जाए। इस प्रकार सरकार द्वारा तय की गई कमेटी जो समाचारपत्रों को चलायेगी, उस पर किसी भी राजनीतिक पार्टी की हुकूमत न होने से वह स्वतंत्र और निष्प्क्ष होकर अपना काम करेगी। कमेटी द्वारा चलाया गया समाचार पत्र अन्य निजी समाचारपत्रों के लिए भी आदर्श होगा और जनता को सभी महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ प्राप्त होगी। सरकार और विरोधी पक्ष के मतों को वह जान सकेगी। कमेटी द्वारा स्थापित समाचार पत्र देश की सभी राजनीतिक पार्टियाँ और विभिन्न विचारों के नेताओं के मतों को निष्पक्ष होकर प्रकाशित करने से किसी एक पार्टी का प्रचार वहाँ नहीं हो पाएगा।' वर्ष 1954 में स्थापित 'भारतीय प्रेस परिषद (Press Council of India)' इसी विचार का प्रतिफलन है जो देश में प्रेस के स्वतंत्रता की रक्षा तथा समाचारों के प्रस्तुतीकरण में वस्तुनिष्ठता तथा उसके विकास को प्रोत्साहित करती है और बाह्य दवाबों से मुक्त रहती है। ''आंबेडकर की पत्रकारिता हमें यही सिखाती है कि जाति, वर्ण, धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र, लिंग, वर्ग आदि शोषणकारी प्रवृत्तियों के प्रति समाज को आगाह कर उसे इन सारे पूर्वाग्रहों और मनोग्रंथियों से मुक्त करने की कोशिश ईमानदारी से की जानी चाहिए। इसी के समांतर मुख्यधारा के सभी पक्षों को दलित मुद्दों के प्रति संवेदनशील बनाने का प्रयास भी किया जाना चाहिए। यह काम संप्रति जो पत्र-पत्रिकाएँ कर रही हैं, उनमें 'फारवर्ड प्रेस', 'बुधन', 'सम्यक भारत', 'दलित दस्तक', 'आदिवासी सत्ता', 'युद्धरत आम आदमी' और 'मैत्री टाइम्स' जैसी पत्रिकाएँ प्रमुख हैं।'' 19
सारांशत: डॉ. आंबेडकर ने सोशल इंजीनियरिंग के द्वारा एक नव समाज निर्मित करने का प्रयास किया, जहां जातिप्रथा रूपी छुआछूत न रहे। एक समाज सुधारक, संविधानशिल्पी, अर्थशास्त्री के रूप में उनका चिंतन विराट था। डॉ.आंबेडकर की पत्रकारिता का संघर्ष 'मूकनायक' के माध्यम से मूक लोगों की आवाज बनने से शुरू होकर 'प्रबुद्ध भारत' के निर्माण के स्वप्न के साथ विराम लेती है। 'प्रबुद्ध भारत' अर्थात् एक नए भारत का निर्माण। बाबासाहेब ने अपनी पत्रकारिता के माध्यम से व्यक्ति व समाज के संबंधों को अधिक सुखमय बनाने के लिए समस्त भारतीय समाज व्यवस्था के पुनर्निर्माण पर बल दिया और उन्होंने सर्वहारा समाज की सांस्कृतिक मूल्यों को एक नए दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत करते हुए अपने संवैधानिक एवं रचनात्मक आंदोलन के द्वारा स्वतंत्रता, समानता, बंधुता एवं न्याय पर आधारित एक नव समाज निर्मित करने का प्रयास किया। उनकी पत्रकारिता अस्पृश्य के साथ-साथ भारतीय समाज जीवन के अनेकानेक प्रश्नों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सुलझाने का प्रयत्न करती है। उनकी पत्रकारिता की यह विशिष्टता है कि वह न केवल दलितों के भीतर आत्मबोध और स्वाभिमान का निर्माण करती है बल्कि उनके मुक्ति संघर्ष का वैचारिक पाठ प्रस्तुत करते हुए ब्राह्मणवादी समाज के अहंकार को तोड़कर उन्हें बुद्धिवादी आत्म-चिकित्सा के लिए प्रोत्साहित भी करती है। जातिगत आधार पर वोट बैंक की राजनीति करने वालों को सामाजिक-आर्थिक समानतापरक विकास पर बल देना चाहिए।
संदर्भ एवं टिप्पणियाँ
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इस लेख में दलित की बजाय अस्पृश्य शब्द का ज्यादा प्रयोग किया गया है क्योंकि डॉ. आंबेडकर के जीवनकाल में दलित शब्द आम प्रचलन का शब्द नहीं था, हालाँकि उन्होंने आधुनिक अर्थों के साथ इस शब्द का प्रयोग 1920 के दशक में ही शुरू कर दिया था।
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मून, वसंत (संपादक): डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर याचे 'बहिष्कृत भारत' आणि 'मूकनायक', पृ. 345
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मूकनायक, पृ. 34
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मून, वसंत (संपादक): डॉ.. बाबासाहेब आंबेडकर याचे 'बहिष्कृत भारत' आणि 'मूकनायक', पृ. 359
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धनंजय कीर, पृ. 33
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मून, वसंत (संपादक): डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर याचे 'बहिष्कृत भारत' आणि 'मूकनायक', पृ. 239
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पूर्वोक्त, पृ. 247
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पानतावणे, डॉ.गंगाधर: पत्रकार डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर, पृ. 65
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आंबेडकर संपूर्ण वांग्मय, खंड-1, पृ. 273
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जाफ़्रलो, क्रिस्तोफ़, 'भीमराव आंबेडकर एक जीवनी', पृ. 86, नई दिल्ली : राजकमल प्रकाशन
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आंबेडकर, डॉ.बी.आर., बाबासाहेब आंबेडकर संपूर्ण वांगमय, खंड 17, संपादक : जगनाथ प्रसाद, डॉ. अंबेडकर प्रतिष्ठान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 1966, पृ. 14
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पूर्वोक्त, खंड 10, पृ. 251
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जमधाड़े, भालचंद्र देविदास, 'आंबेडकर पत्रकारिता की वैचारिकी', पृ. 159, दिल्ली इंशा पब्लिकेशन
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प्रासंगिक विचार : जनता प्रवेशांक, 24 नवंबर 1930, संपादक- देवराव विष्णु नाईक
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प्रबुद्ध भारत : प्रवेशांक वर्ष 1 ला, 4 फरवरी 1956, संपादक बी.सी. कांबले एवं संपादक मंडल
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कृपाशंकर चौबे जी के फेसबुक वाल से
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https://www.bbc.com/hindi/india-51301513
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पूर्वोक्त
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https://www.forwardpress.in/2017/07/vartma-ke-sandrbh-men-ambedkar-ki-patrakarita-ka-mahatv/
(*लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में सहायक संपादक हैं। संपर्क: 9970244359)